लाल हुई ज़मीन, फिर किसी मासूम रक्त से। नन्ही सी जान खूब लडी,उस महरूम वक्त से। कोख से बचकर आयी थी मैं। सोचा पढ़-लिखकर के दहेज से भी बच जाऊँगी। लेकिन अच्छा होता कोख में ही मर जाती। क्योंकि सड़को पर युं सरेआम नोचि तो न जाती मैं, गलती नहीं थी मेरी कि बिहार, उत्तर प्रदेश या कश्मीर से थी मैं। मेरी गलती बस इतनी थी कि “बेटी थी मैं ” परोपकार कर बेटियो पर वो शोषण हर रोज़ होता हैं। हर लड़की खुद को बचाने के लिये बिलख -बिलख कर रोती है। कन्याभ्रूण हत्या जैसी आज भी है। देश मे कुरितियां जब -जब होता है। शोषण आ जाती बीच राजनीतियां। मैं बेटी हुं मृत्यु शैय्या पर लेटी हूँ। आज सुननी होगी पुकार, क्योंकि बहरी हो गयी है सरकार। औरतो पर अत्याचार के, कई रूप देखें पर सहम सा गया। जब क्यों पैदा की इस बात पर उठते हाथ देखे। बेटी ,बहू, बहनो पर कर लो तुम चाहे कितने भी अत्याचार पर याद रखना व्यर्थ नही जाती बेटी, बहू ,बहनो पर हो रहे। अत्याचारो की चीख पुकार किसी न किसी रुप में उन पर हुए अत्याचारो का बदला लेने जरूर आता है। वो सृष्टि का सृजन हार।

ये सोच ही खराब है,स्त्री स्वतंत्रता हनन का ये पहला चरण है। हर एक की सोच बदलेगी, तभी जमाना बदलेगा। वरना हर रोज किसी निर्भया का नाम अखबारों मे निकलेगा। बीत गए कुछ साल, कुछ नहीं बदला, बस बदल गयी सरकार। ना बदली सोच,न बदले लोगो के विचार, बस बदल गयी सरकार। निर्भया हम शर्मिंदा है,तेरे कातिल जिंदा है। शायद उस दिन ताला टूटे संविधान का, जिस दिन जिस्म निचोड़ा जाएगा किसी मंत्री की बेटी का।

Share it

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »